सबसे ज्यादा कष्ट हुआ इस महान आत्मा को

By: Red Alert Bureau
Sep 20, 2019

यह सबसे बड़ी कहानी है स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती की
सबसे ज्यादा कष्ट हुआ इस महान आत्मा को 

शाहजहाॅपुर। आज उतनी मयस्सर नहीं है मयखाने मे, जितनी छोड़ दिया करते थे पैमाने में। भारत सरकार में पूर्व में गृह राज्यमंत्री, उत्तर प्रदेश के तीन बड़े जनपदो से सांसद रहे। एक बेहद प्रतिष्ठापूर्ण शिक्षा संस्थान के सर्वेसर्वा संत चिन्मयानंद बेहद रसूख वाले थे। उनकी बेहद करीबी योग्य साध्वी चिदर्पिता वर्तमान नाम कोमल कृष्णा जिन्होने मुमुक्षु आश्रम में स्वामी के रसूख की छत्रछाया में पद और प्रतिष्ठा पाई थी। उन्होने जब स्वामी पर चरित्र हनन का आरोप लगाया वह दौर स्वामी के बेहद रसूख वाला था। पद, पैसा, पूड़ी सत्ता रसूख ने उस वक्त उन गंभीर आरोपो से बचने में स्वामी चिन्मयानंद की मदद की और राज्य सरकार ने उनका मुकदमा लेने का फरमान जारी किया। शायद यह फरमान स्वामी के लिए घमंड का आसमान बन गया और उन्होने नीचे देखकर चलना बंद कर दिया। सूत्र बताते है कि इस बार की यूपी की भगवा सरकार आने के बाद उनके सुर किसी सामंती घमंडी और बिगड़ैल राजा जैसे थे। वह जनप्रतिनिधियों तक से बेहद घमंड और गुरूर में बात करते थे। यही से उनके पतन की शुरूआत हुई और पैसा और प्रतिष्ठा और उसकी आड़ में नैतिक पतन का वह घिनौना खेल स्वामी चिन्मयानंद ने खेला जिसमें उनकी सन 1989 में शाहजहाँपुर आये स्वामी चिन्मयानंद आध्यात्मिक प्रज्ञा से परिपूर्ण रहे, प्रारम्भिक दिनों में दूर दूर तक आपके द्वारा गाई गयी रामकथा का अपार यश फैला। 1991 में जब श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन छिड़ा तो अपनी सक्रियता के कारण आप राष्ट्रीय स्तर तक चमके। भारतीय सन्त समाज की स्थापना कर आप रामजन्म भूमि आंदोलन के सयोंजक बन गए और आपको साथ मिला गोरखनाथ पीठ के महंत अवैधनाथ का जो वर्तमान मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश शासन योगी आदित्यनाथ के गुरु थे। आपके नेतृत्व में मुमुक्षु शिक्षा संकुल निरन्तर उन्नति करता गया। वर्ष 2004 में आप अटल बिहारी सरकार में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री के पद पर आसीन हुए। उन दिनों शाहजहाँपुर भारत के अंदर चमक रहा था। भाजपा सरकार के पतन के बाद भी आपकी सक्रियता कम न हुई और देश विदेश में आप हिन्दू धर्म समाज के अनेकानेक कार्यो में रत रहे। वर्ष 2017 में प्रदेश में योगी सरकार बनते ही मुमुक्षु आश्रम प्रदेश की सम्प्रभुता का केंद्र बन कर उभरा, अनेक जिलों के डीएम, एसपी, सचिव इत्यादि आला अधिकारी आश्रम से मिलने वाले निर्देश पा कर अहोभाग्य मानते थे। इस प्रतिष्ठापूर्ण जीवन के बाद भी वह अपने नैतिक बल को नहीं बचा पाये। किसी संत के लिए गिरावट का इससे खराब दौर और क्या हो सकता है कि वह अपनी उम्र से लगभग 50 साल छोटी अपने ही विद्यालय की छात्रा के साथ अपने इतिहास, अपनी संत परंपरा एवं प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की प्रतिष्ठा के साथ मुंह काला करते रहे। शायद उन्हे ऐसा लगा होगा कि उनका इतिहास जो उज्जवल था वह इस घोर नैतिक पतन को ढक लेगा पर अफसोस अब शायद बदनामी का यह काला धब्बा सोशल मीडिया के युग में छोटे-छोटे बच्चे वीडियो देखकर कहेंगे छी.....और सबसे ज्यादा कष्ट होगा महान संत स्वामी शुकदेवानन्द की आत्मा को।




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