मातृ दिवस : मां तो मां ही होती है

By: Red Alert Bureau
May 13, 2017

एक माँ को सम्मान और आदर देने के लिये हर वर्ष एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मातृदिवस को मनाया जाता है। ये आधुनिक समय का उत्सव है जिसकी उत्पत्ति उत्तरी अमेरिका में माताओं को सम्मान देने के लिये हुई थी। बच्चों से माँ के रिश्तों में प्रगाढ़ता बढ़ाने के साथ ही मातृत्व को सलाम करने के लिये इसे मनाया जाता है। समाज में माँ का प्रभाव बढ़ाने के लिये इसे मनाया जाता है। पूरे विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग तारीखों पर हर वर्ष मातृ दिवस को मनाया जाता है। भारत में, इसे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है।
मातृ दिवस 2017 भारत में 14 मई, रविवार को मनाया जायेगा। ये हर वर्ष मई महीने के दूसरे रविवार को पड़ता है।
प्राचीन काल में ग्रीक और रोमन के द्वारा पहली बार इसे मनाने की शुरुआत हुयी। हालाँकि, 'ममता रविवारÓ के रुप में यूके में भी इस उत्सव को देखा गया था। मातृदिवस का उत्सव सभी जगह आधुनिक हो चुका है। इसे बेहद आधुनिक तरीके से मनाया जाता है ना कि पुराने वर्षों के पुराने तरीकों की तरह। अलग-अलग तारीखों पर दुनिया के लगभग 46 देशों में इसे मनाया जाता है। ये सभी के लिये एक बड़ा उत्सव है जब लोगों को अपनी माँ का सम्मान करने का मौका मिलता है। हमें इतिहास को धन्यवाद देना चाहिये जो मातृ दिवस की उत्पत्ति का कारण था।
पूर्व में, ग्रीक के प्राचीन लोग वार्षिक वसंत ऋतु त्योहारों के खास अवसरों पर अपनी देवी माता के लिये अत्यधिक समर्पित थे। ग्रीक पौराणिक कथाओं के अनुसार, रिहिह (अर्थात् बहुत सारी देवियों की माताओं के साथ ही क्रोनस की पत्नी) के सम्मान के लिये इस अवसर को वो मनाते थे।
प्राचीन रोमन लोग हिलैरिया के नाम से एक वसंत ऋतु त्योंहार को भी मनाते थे जो सीबेल (अर्थात् एक देवी माता) के लिये समर्पित था। उसी समय, मंदिर में सीबेल देवी माँ के सामने भक्त चढ़ावा चढ़ाते थे। पूरा उत्सव तीन दिन के लिये आयोजित होता था जिसमें ढ़ेर सारी गतिविधियाँ जैसे कई प्रकार के खेल, परेड और चेहरा लगाकर स्वाँग रचना होता था। कुँवारी मैरी (ईशु की माँ) को सम्मान देने के लिये चौथे रविवार को ईसाईयों के द्वारा भी मातृ दिवस को मनाया जाता है। 1600 इंसवी के लगभग इंग्लैण्ड में मातृ दिवस मनाने उत्सव का एक अलग इतिहास है। ईसाई कुँवारी मैरी की पूजा करते हैं, उन्हें कुछ फूल और उपहार चढ़ाते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
वर्ष 1972 में जूलिया वार्ड हौवे (एक कवि, कार्यकर्ता और लेखक) के विचारों के द्वारा आधिकारिक कार्यक्रम के रुप में यूएस में मातृ दिवस को मनाने का फैसला किया गया था। जून के दूसरे रविवार को मातृ शांति दिवस और 2 जून को मनाने के लिये एक शांति कार्यक्रम के रुप में उन्होंने मातृ दिवस की सलाह दी थी।
अन्ना जारविस, यूएस में मातृ दिवस (मातृ दिवस की माँ के रुप में प्रसिद्ध) के संस्थापक के रुप में जाने जाते हैं यद्यपि वो अविवाहित महिला थी और उनको बच्चे नहीं थे। अपनी माँ के प्यार और परवरिश से वो अत्यधिक प्रेरित थी और उनकी मृत्यु के बाद दुनिया की सभी माँ को सम्मान और उनके सच्चे प्यार के प्रतीक स्वरुप एक दिन माँ को समर्पित करने के लिये कहा।
आज के दिनों में, ये कई देशों में मनाया जाता है जैसे यूके, चाईना, भारत, यूएस, मेक्सिको, डेनमार्क, इटली, फिनलैण्ड, तुर्की, ऑस्ट्रेलिया, कैनेडा, जापान और बेल्जियम आदि। अपनी माँ को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिये कई सारे क्रिया-कलापों को आयोजित करने के द्वारा बहुत ही उत्साह और खुशी के साथ लोग इस दिन को मनाते हैं।
सभी के लिये मातृ दिवस वर्ष का एक बहुत ही खास दिन होता है। जो लोग अपनी माँ को बहुत प्यार करते हैं और ख्याल रखते हैं वो इस खास दिन को कई तरह से मनाते हैं। ये साल एकमात्र दिन है जिसे दुनिया की सभी माँ को समर्पित किया जाता है। विभिन्न देशों में रहने वाले लोग इस उत्सव को अलग अलग तारीखों पर मनाते हैं साथ ही अपने देश के नियमों और कैलेंडर का अनुसरण इस प्यारे त्योंहार को मनाने के लिये करते हैं।
भारत में इसे हर साल मई के दूसरे रविवार को देश के लगभग हर क्षेत्र में मनाया जाता है। पूरे भारत में आज के आधुनिक समय में इस उत्सव को मनाने का तरीका बहुत बदल चुका है। ये अब समाज के लिये बहुत बड़ा जागरुकता कार्यक्रम बन चुका है। सभी अपने तरीके से इस उत्सव में भाग लेते हैं और इसे मनाते हैं। विविधता से भरे इस देश में ये विदेशी उत्सव की मौजूदगी का इशारा है। ये एक वैश्विक त्योहार है जो कई देशों में मनाया जाता है।
समाज में एक विशाल क्रांति कम्प्यूटर और इंटरनेट जैसी उच्च तकनीक ले आयी है जो आमतौर पर हर जगह दिखाई देता है। आज के दिनों में, लोग अपने रिश्तों के बारे में बहुत जागरुक रहते हैं और इसे मनाने के द्वारा सम्मान और आदर देना चाहते हैं। भारत एक महान संस्कृति और परंपराओं का देश है जहाँ लोग अपनी माँ को पहली प्राथमिकता देते हैं। इसलिये, हमारे लिये यहाँ मातृ दिवस का उत्सव बहुत मायने रखता है। ये वो दिन है जब हम अपनी माँ के प्यार, देखभाल, कड़ी मेहनत और प्रेरणादायक विचारों को महसूस करते हैं। हमारे जीवन में वो एक महान इंसान है जिसके बिना हम एक सरल जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वो एक ऐसी व्यक्ति हैं जो हमारे जीवन को अपने प्यार के साथ बहुत आसान बना देती है।
इसलिये, मातृ दिवस के उत्सव के द्वारा, हमें पूरे साल में केवल एक दिन मिलता है अपनी माँ के प्रति आभार जताने के लिये। उनके महत्व को समझने के द्वारा ये खुशी मनाने का दिन है और उन्हें सम्मान देने का है। एक माँ एक देवी की तरह होती है जो अपने बच्चों से कुछ भी वापस नहीं पाना चाहती है। वो अपने बच्चों को केवल जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाना चाहती हैं। हमारी माँ हमारे लिये प्रेरणादायक और पथप्रदर्शक शक्ति के रुप में है जो हमें हमेशा आगे बढऩे में और किसी भी समस्या से उभरने में मदद देती है।
माँ के महत्व और इस उत्सव के बारे में उन्हें जागरुक बनाने के लिये बच्चों के सामने इसे मनाने के लिये शिक्षकों के द्वारा स्कूल में मातृ दिवस पर एक बड़ा उत्सव आयोजित किया जाता है। इस उत्सव का हिस्सा बनने के लिये खासतौर से छोटे बच्चों की माताओं को आमंत्रित किया जाता है। इस दिन, हर बच्चा अपनी माँ के बारे में कविता, निबंध लेखन, भाषण करना, नृत्य, संगीत, बात-चीत आदि के द्वारा कुछ कहता है। कक्षा में अपने बच्चों के लिये कुछ कर दिखाने के लिये स्कूल के शिक्षकों के द्वारा माताओं को भी अपने बच्चों के लिये कुछ करने या कहने को कहा जाता है। आमतौर पर माँ अपने बच्चों के लिये नृत्य और संगीत की प्रस्तुति देती हैं। उत्सव के अंत में कक्षा के सभी विद्यार्थियों के लिये माताएँ भी कुछ प्यारे पकवान बना कर लाती हैं और सभी को एक-बराबर बाँट देती हैं। बच्चे भी अपनी माँ के लिये हाथ से बने ग्रीटींग कार्ड और उपहार के रुप में दूसरी चीजें भेंट करते हैं। इस दिन को अलग तरीके से मनाने के लिये बच्चे रेस्टोरेंट, मॉल, पार्क आदि जगहों पर अपने माता-पिता के साथ मस्ती करने के लिये जाते हैं।
ईसाई धर्म से जुड़े लोग इसे अपने तरीके से मनाते हैं। अपनी माँ के सम्मान के लिये चर्च में भगवान की इस दिन खास पूजा करते हैं। उन्हें ग्रीटिंग कार्ड और बिस्तर पर नाश्ता देने के द्वारा बच्चे अपनी माँ को आश्चर्यजनक उपहार देते हैं। इस दिन, बच्चे अपनी माँ को सुबह देर तक सोने देते हैं और उन्हें तंग नहीं करते साथ ही उनके लिये लजीज व्यंजन बनाकर खुश करते हैं। अपनी माँ को खुश करने के लिये कुछ बच्चे रेडीमेड उपहार, कपड़े, पर्स, सहायक सामग्री, जेवर आदि खरीदते हैं। रात में, सभी अपने परिवार के साथ घर या रेस्टोरेंट में अच्छे पकवानों का आनन्द उठाते हैं। परिवार के साथ खुशी मनाने और ढ़ेर सारी मस्ती करने के लिये बच्चों को इस दिन अच्छे से मनाने का पूरा मौका देने के लिये कुछ देशों में मातृ दिवस एक अवकाश होता है। ये सभी माँओं के लिये एक बहुत ही सुंदर दिन है, इस दिन उन्हें घर के सभी कामों और जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाता है।
नारी बड़ी विचित्र प्रकृति की होती है। वह पक्षी के समान आकाश में स्वच्छंद घूमकर इतनी खुशी महसूस नहीं करती जितनी पति, बच्चों और परिवार में बंधकर करती है । पति की पसंद को अपनी पसंद मानकर वह आनंदित होती है, लेकिन इतने त्याग, बलिदान और समर्पण पर भी उसे अपेक्षित आदर व स्नेह नहीं मिलता तो निराश होना स्वाभाविक है। आठ मई को मातृ दिवस है और नौ मई को परिवार दिवस होता है। जब हम मां की महत्ता की चर्चा करेंगे, उसे धरती की उपमा देंगे जो सारे दु:ख अपनी छाती पर झेल लेती है लेकिन बच्चों तक गरम हवा नहीं पहुंचने देती। मां का दर्जा भगवान से ऊपर है या मां के चरणों में ही जीवन का असली सुख है कहने वाले अधिकांश लोग क्या सच नहीं बोलेंगे । क्योंकि हम तो मां दिवस पर मां को सुंदर शब्दों से सजा एक कार्ड या कोई छोटा-बड़ा उपहार देकर इस दिवस की रस्म पूरी कर देंगे। मां क्या होती है, यह जानने की कोशिश भी नहीं करेंगे। मातृ दिवस प्रत्येक वर्ष मई माह के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। मां को खुशियाँ और सम्मान देने के लिए पूरी ज़िंदगी भी कम होती है। फिर भी विश्व में मां के सम्मान में मातृ दिवस मनाया जाता है। मातृ दिवस विश्व के अलग - अलग भागों में अलग - अलग तरीकों से मनाया जाता है। हालांकि भारत के कुछ भागों में इसे 19 अगस्त को भी मनाया जाता है, परन्तु अधिक महत्ता अमरीकी आधार पर मनाए जाने वाले मातृ दिवस की है, अमेरिका में यह दिन इतना महत्त्वपूर्ण है कि यह एकदम से उत्सव की तरह मनाया जाता है।
मातृदिवस का इतिहास:- मातृदिवस का इतिहास सदियों पुराना एवं प्राचीन है। यूनान में बसंत ऋतु के आगमन पर रिहा परमेश्वर की मां को सम्मानित करने के लिए यह दिवस मनाया जाता था। 16वीं सदी में इंग्लैण्ड का ईसाई समुदाय ईशु की मां मदर मेरी को सम्मानित करने के लिए यह त्योहार मनाने लगा। क्वमदर्स डेÓ मनाने का मूल कारण समस्त माओं को सम्मान देना और एक शिशु के उत्थान में उसकी महान भूमिका को सलाम करना है। मातृ दिवस की घोषणा सबसे पहले अमरीकी राष्ट्रपति वूडरो विलसन ने 8 मई, 1914 को लिया। 8 मई, 1914 में अन्ना की कठिन मेहनत के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाने और मां के सम्मान में एक दिन के अवकाश की सार्वजनिक घोषणा की। उन्होंने मई माह के दूसरे रविवार को इस संबंध में एक संयुक्त प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये। उल्लेखनीय है कि यह दिवस मनाने का अर्थ मां के स्नेह और त्याग के आगे नतमस्तक होना और उन्हें महसूस करवाना कि बच्चों की जिंदगी में वह कितनी खास हैं। वे समझ रहे थे कि सम्मान, श्रद्धा के साथ माताओं का सशक्तीकरण होना चाहिए, जिससे मातृत्व शक्ति के प्रभाव से युद्धों की विभीषिका रुके। तब से हर वर्ष मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है। वैसे भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया बेल्जियम, ब्राजील, कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, यूनान, इटली, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, तुर्की आदि कई देशों में मातृ दिवस मई माह के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। जबकि पाकिस्तान, बहरीन, मलेशिया, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में मातृ दिवस दस मई को होता है। रूस में 28 नवंबर, पोलैंड 26 मई, इंडोनिशिया 22 दिसंबर, मिस्र में 21 मार्च, नार्वे में 13 फरवरी और स्वीडन में मई के अंतिम रविवार को मातृ दिवस के रूप में मनाया जाता है। थाईलैंड में वहां की महारानी सिरिकत कित्याकारा का जन्मदिवस 12 अगस्त को होता है इसलिए वहां मातृ दिवस उन्हें समर्पित किया जाता है। अमेरिका की एक कवयित्री और लेखिका जूलिया वार्ड होव ने 1870 में 10 मई को माँ के नाम समर्पित करते हुए कई रचनाएँ लिखीं। वे मानती थीं कि महिलाओं की सामाजिक ज़िम्मेदारी व्यापक होनी चाहिए। अमेरिका में मातृ दिवस (मदर्स डे) पर राष्ट्रीय अवकाश होता है। अलग-अलग देशों में मदर्स डे अलग अलग तारीख पर मनाया जाता है। भारत में भी मदर्स डे का महत्व बढ़ रहा है।
माँ सम्मान से जुड़ी बातें:- जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मॉं के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। ये शब्द हैं प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं। किसी औलाद के लिए 'माँÓ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए मां शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है। क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में मां ही क्यों याद आती है क्योंकि वो मां ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्में होते हैं। बचपन में हमारा रातों का जागना.. जिस वजह से कई रातों तक मां सो भी नहीं पाती थी। जितना मां ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। ज़ाहिर है मां के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी भी कम है।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:, परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुत:।
मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे, कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।
(अर्थात : पृथ्वी पर जितने भी पुत्रों की मां हैं, वह अत्यंत सरल रूप में हैं। कहने का मतलब कि मां एकदम से सहज रूप में होती हैं। वे अपने पुत्रों पर शीघ्रता से प्रसन्न हो जाती हैं। वह अपनी समस्त खुशियां पुत्रों के लिए त्याग देती हैं, क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती।)
निदा फ़ाज़ली का दोहा- 'इक पलड़े में प्यार रख, दूजे में संसार, तोले से ही जानिए, किसमें कितना प्यारÓ
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता- 'ज्बेटा ! कहीं चोट तो नहीं लगी।'
'देश के सुदूर पश्चिम में स्थित अर्बुदांचल की एक जीवंत संस्कृति है, जहां विपुल मात्रा में कथा, बोध कथाएं, कहानियां, गीत, संगीत लोक में प्रचलित है। मां की ममता पर यहां लोक में एक कहानी प्रचलित है, जो अविरल प्रस्तुत किया जाता रहा है। कहते हैं एक बार एक युवक को एक लड़की पर दिल आ गया। प्रेम में वह ऐसा खोया कि वह सबकुछ भुला बैठा। लड़के के शादी का प्रस्ताव रखने पर लड़की ने जवाब दिया कि वह उससे विवाह करने को तैयार तो है, लेकिन वह अपनी सास के रूप में किसी को देखना नहीं चाहती। अत: वह अपनी मां का कत्ल कर उसका कलेजा निकाल लाए, तो वह उससे शादी करेगी। युवक पहले काफ़ी दुविधा में रहा, लेकिन फिर अपनी माशूका के लिए मां का कत्ल कर उसका कलेजा निकाल तेजी से प्रेमिका की ओर बढ़ा। तेजी में जाने की हड़बड़ी में उसे ठोकर लगी और वह गिर पड़ा। इस पर मां का कलेजा गिर पड़ा और कलेजे से आवाज़ आई, बेटा, कहीं चोट तो नहीं लगीज्आ बेटा, पट्टी बांध दूंज्।'
मां में छिपी है सृष्टि मां शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। इसका अनुभव भी एक मां ही कर सकती है। मां अपने आप में पूर्ण संस्कारवान, मनुष्यत्व व सरलता के गुणों का सागर है। मां जन्मदाता ही नहीं, बल्कि पालन-पोषण करने वाली भी है। मां है ममता का सागर मां तो ममता की सागर होती है। जब वह बच्चे को जन्म देकर बड़ा करती है तो उसे इस बात की खुशी होती है, उसके लाड़ले पुत्र-पुत्री से अब सुख मिल जाएगा। लेकिन मां की इस ममता को नहीं समझने वाले कुछ बच्चे यह भूल बैठते हैं कि इनके पालन-पोषण के दौरान इस मां ने कितनी कठिनाइयां झेली होगी।
किस दिन मनाया जाय:- मातृ दिवस किसी भी दिन मनाया जाये क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि बच्चों का हर पल मां के साये में गुजरता है। अपने पांव पर खड़े होने के बाद ये बच्चे उनकी देखभाल करें या न करें मां तो हर परिस्थिति में, धूप में छांव और सर्दी में अलाव बनकर उनके साथ रहती है। सच तो यह है कि जब हम बच्चे होते हैं तो हमारी मां हमारे लिये वह इनसान होती है जिसके मुंह से परियों राजा-रानी की कहानियां सुनते हुए और सपने बुनते हुए, उसकी गोद में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हुए हम नींद की गोद में खो जाते हैं। उसकी लोरियां हमें ठंडी हवा के झोंके का सा अहसास कराती हैं। जब हम परीक्षाओं की तैयारी करते हुए तनाव महसूस करते हैं तब मां हमारा मार्गदर्शन करके हमें निराशा के भंवर से बाहर निकालती है।
एक मां अपने बच्चे के जीवन में समय के साथ-साथ अलग-अलग भूमिका निभाती है और सुसंस्कृत संस्कारों से सींचकर उसे समाज का एक सभ्य और उपयोगी अंग बनाने में अपनी पूरी जिंदगी लगा देती है। परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने में स्वयं का अस्तित्व खोने वाली अपनी मां को यह अहसास दिलाएं कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं और वह हमारी जिंदगी में कितनी खास हैं। मां एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही कानों में मीठी-सी अनुभूति होने लगती है। ईश्वर प्रत्येक स्थान में विद्यमान नहीं रह सकता इसलिए उसने हर जगह मौजूद रहने के लिए मां बनायी। मातृस्वरूप में ईश्वर की कल्पना की जा सकती है। मां का सान्निध्य, स्नेह व प्यार मां की गोद में सदा उपलब्ध रहता है और यह बात तो वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध की है कि मां के स्पर्श से मनुष्य के शरीर में एक अलग प्रकार के हार्मोन्स का स्राव होता है जिससे हर बच्चे को अपनी मां के सान्निध्य में एक प्रकार की सुरक्षा की अनुभूति होती है।
सोचने की बात यह है कि आखिर हम कहां से कहा आ गये हैं। एक तरफ हम आदर्श बेटे श्रवण की गाथा गाते हैं जो अपने मां-बाप की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें 'बहंगीÓ में बिठाकर तीर्थयात्रा करवाने ले गया था। उस राम की बात करते हैं जो सौतेली मां के वचन को रखने के लिए चौदह वर्ष का वनवास काट आया। उस पुत्र भीष्म पितामह की बात करते हैं जिसने बाप की खातिर आजीवन कुंआरा रहने की कसम खायी और ऐसी महिलाएं तो अनगिनत हैं जिन्होंने अपने परिवार और बच्चों को बचाने के लिए प्राणों की आहुति दे दी। आज समाज में घट रही घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है जैसे मां-बाप के प्रति स्नेह, आदर व सम्मान दुर्लभ वस्तुओं की तरह लुप्त होता जा रहा है।
एक किनारे या दूसरे किनारे का नाम नदी नहीं, बल्कि दोनों किनारों के बीच बहने वाली धारा का नाम है नदी— यह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। बच्चे तेजी से पश्चिमी सभ्यता में बह रहे हैं, बड़ों का सम्मान करने की परंपरा से उनका नाता टूटता नजर आ रहा है। कहीं इस सबके लिए हम स्वयं भी तो दोषी नहीं हैं। बच्चे तो मां-बाप की फसल होते हैं, 'जैसा बीज व खाद डालोगे वे वैसे हो जाएंगे। ठीक ही तो कहते हैं, 'जैसा खाओ अन्न वैसा पाओ मन।' हमारी संस्कृति में मां को सबसे ऊंचा दर्जा दिया गया है। शायद इसीलिए कि वह बच्चे को नौ महीने अपनी कोख में रखकर उसे दुनिया में आने का रास्ता दिखाती है। इतना ही नहीं, दुनिया में आकर वह महीनों उसके दूध पर ही जिंदा रहता है। इसीलिए तो कई बार विकट परिस्थितियों में वह उसे अपने दूध का वास्ता देती है और कभी-कभी अपने दूध का हिसाब भी मांगती है। बच्चे भी उसके दूध की रक्षा करने के लिए अपनी जान पर खेल जाते हैं। मातृ दिवस हो या परिवार दिवस, जरूरत इन शब्दों की आत्मा को समझने की है। मां-बाप में त्याग की भावना हो और बच्चों में बड़ों का सम्मान करने का जजबा हो तभी परिवार की नींव मजबूत हो सकती है।
दिन को यादगार बनाएँ :-सुबह उठते ही अपनी मां को इस दिन की बधाई दें। यदि आपको उनके हाथ का भोजन बहुत पंसद है, और खाना बनाना उनका शौक़ भी है, तो उन्हें नए और स्वादिष्ट व्यंजन की एक किताब व डिनर टेबल गिफ़्ट सेट जैसा कुछ उपहार दें। यदि उन्हें संगीत का शौक़ है, तो उनके पसन्दीदा गानों व संगीत की कोई डीवीडी व कैसेट् उपहार में दें, जिससे व ख़ाली समय में घर का काम करते समय सुन सकें। आए दिन छोटे होते घरों को देखते हुए आप उन्हें एक क्वहोम गार्डनÓ भी उपहार में दे सकते हैं। ये छोटा बगीचा घर की रौनक भी बढ़ाएगा और आपकी मां को व्यस्त भी रखेगा। सुन्दर पौधे घर में बेहतर वातावरण भी बनाए रखेगा। आपका घर व किचन एक ऐसा स्थान है जहाँ आपकी मां अधिक समय बिताती हैं। तो इस अवसर पर आप ड्राइंग रूम और बेडरूम के साथ साथ किचन को भी अच्छे से सज़ा सकते हैं। उन्हें कहीं बाहर घुमाने ले जाएँ। और यदि किसी नज़दीकी जगह पर घूमने का कार्यक्रम बना सकते हों, तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है। मूड़ बदलने के साथ-साथ आपकी पिकनिक ट्रिप उन्हें प्रकृति के कऱीब लाएगी और वे बेहतर महसूस करेगीं। इस प्रकार आप अपनी मां के लिए ये मातृ दिवस (मदर्स डे) स्पेशल बना सकते हैं। अगाथा क्रिस्टी के शब्दों में, 'एक शिशु के लिए उसकी मां का लाड़ - प्यार दुनिया की किसी भी वस्तु के सामने अतुलनीय है। इस प्रेम की कोई सीमा नहीं होती और ये किसी क़ानून को नहीं मानता।' सन् 2011 की जनगणना के आंकड़ों से एक नया रुझान देखने को मिला है। प्रजनन दर घट रही है, जिससे बच्चों की आबादी घटनी और बूढ़ों की बढऩी शुरू हो गई है। अनुमान है कि इस रुझान से 2026 तक देश में बूढ़ों की संख्या लगभग दोगुनी यानी 17 करोड़ हो जाएगी। इन हालात में बूढ़े मां-बाप की देखभाल और भी जरूरी हो जाती है। बहरहाल मातृ दिवस के अवसर पर मां और संतान के बीच स्नेह और गरिमा बनाये रखने का संकल्प तो हम ले ही सकते हैं।
एजेंसी

 

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