मनाली के हिडिंबा मंदिर में दर्शन मात्र से होती हैं मन की मुरादें पूरी

By: Red Alert Bureau
Nov 22, 2018

मनाली के हिडिंबा मंदिर में दर्शन मात्र से होती हैं मन की मुरादें पूरी
16 वीं सदी में बना हिडिंबा मंदिर मनाली के खास टूरिस्ट डेस्टनेशन्स में से एक है। दैवीय शक्तियां प्राप्त कर असुरों का नाश कर राक्षस से देवी बनी महाकाली स्वरूप कुल्लू घाटी की अराध्य देवी माता हिडिंबा पर लोगों की अपार आस्था है। ज्येष्ठ संक्रांति को प्रकट होकर माता हिडिंबा ने अपनी मायावी व दैवीय शक्ति से असुरों का नाश किया व दुर्गा रूप में प्रकट हुई। घाटी के देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों ने खुशी मनाकर माता का स्वागत किया। लोगों का मानना है कि यहां आकर दर्शन करने मात्र से मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं।
गर्मियों से लेकर सर्दियों तक में टूरिस्टों से भरे मनाली की शान है माता हिडिंबा मंदिर। यहां आकर हिडिंबा मंदिर देखे बिना मनाली का सफर अधूरा है। माता के दर्शन के लिए मंदिर में लंबी लाइन लगती है। मनाली से एक किलोमीटर दूर देवदार के घने व ऊंचे जंगलों के बीच लगभग 82 फुट ऊंचे पगौड़ा शैली के इस मंदिर को कुल्लू के राजा बहादुर ने सन् 1553 में बनवाया था। मंदिर के अंदर माता हिडिंबा की चरण पादुका हैं। माता जन्म से राक्षसी थी लेकिन तप व त्याग के बाद देवी मानी गई। कुल्लत राजवंश की दादी कही जाने वाली माता हिडिंबा के आगमन के बाद ही अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे का आगमन होता है।
लोगों की कामना को पूरा करने वाली माता हिडिंबा का जन्मदिवस हर साल 14 से 17 मई तक मनाया जाता है जिसकी रौनक ढुंगरी व मनु महाराज की नगरी मनाली गांव में भी रहती है। माता हिडिंबा के जन्मदिवस पर मंदिर परिसर में दशहरे जैसे माहौल रहता है इस उत्सव को छोटा दशहरा भी कहा जाता है। घाटी के दर्जन भर देवी-देवता माता के जन्मदिवस पर शामिल होते हैं तथा अपने भक्तों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। ज्येष्ठ की संक्रांति को धरती पर अवतार लेने वाली महामाई ने देवी-देवताओं पर अत्याचार करने वाले राक्षसों का वध कर सभी ऋषि-मुनियों को राहत पहुंचाई थी। मेले के दौरान माता हिडिंबा परिसर स्वर्ग लोक में और आसपास का माहौल भक्तिमय हो जाता है।

 




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